इसके बाद जो घटा, उस पर यकीन करना-न करना आपकी इच्छा पर है मिस्टर बैनर्जी, लेकिन यह कहानी मैंने पिताजी के मुँह से बहुत बार सुनी है, हमारे वंश की घटना है यह, इसलिए मैं आपको झूठी गप्प सुना रहा हूँ— कम-से-कम इतना मत सोचिएगा। दादाजी ने देखा कि वे हंस साधारण हंसों-जैसे नहीं थे, बड़े थे— बहुत-बहुत बड़े थे। उनकी गतिविधियाँ हंसों-जैसी नहीं थीं। इसके बाद उन्हें अनुभव हुआ कि वास्तव में वे हंस ही नहीं थे— वे मनुष्यों-जैसे थे! बेचारे दादाजी ने फिर आँखों को मला। दो-तीन घूँट अर्क पीकर ही आज यह क्या दशा हो रही थी! इसके बाद वे जीव पानी में उतरे और हंसों की तरह तैरते हुए उस तरफ आये, जिधर दादाजी छुपे हुए थे; बिलकुल पास आ गये वे। कृष्णा द्वितीया की परिपूर्ण ज्योत्स्ना में विस्मित, भीत-चकित, दुस्साहसी, अर्कसेव