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“मैं था, मैं नहीं हूँ “

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“मैं था, मैं नहीं हूँ”
ज़िंदगी और मृत्यु के बीच फैले उस गहरे मौन की कविता है, जहाँ मनुष्य अपने अस्तित्व से प्रश्न करता है। यह केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि आत्मा की यात्रा है—बीते हुए क्षणों, खोए हुए सपनों और उन भावनाओं का दर्पण जिन्हें हम अक्सर कह नहीं पाते। “ज़िंदगी की गहराइयों में छिपे दर्द और सवाल अक्सर शब्दों का रूप ले लेते हैं।

यह कविता संग्रह उन एहसासों की आवाज़ है,

जो कहे भी नहीं गए और भुलाए भी नहीं जा सके।

‘मैं था, मैं नहीं हूँ’—

एक सफ़र, जहाँ वजूद की परछाइयाँ हमें आईना दिखाती हैं।”

इस कविता-संग्रह में पाठक पाएँगे—

जीवन और मृत्यु पर दार्शनिक चिंतन
टूटन और बिछड़न की पीड़ा
आत्म-अवलोकन की गहराई
आशा और निराशा के बीच झूलते भाव
हर क

6 pages, Kindle Edition

Published August 25, 2025

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Ashok Bhatnagar

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