यह पुस्तक कई छोटी-छोटी कहानियों का संकलन है, जिनमें से एक कहानी के शीर्षक को ही पुस्तक का शीर्षक रखा गया है। मैं एक लेखक के रूप में स्वयं अपनी पुस्तक की प्रशंसा नहीं कर सकता, क्योंकि यह कार्य पाठकों को ही शोभा देता है और यही तर्कसंगत भी है। परंतु पुस्तक को पढ़ने से पहले हर पाठक यह जानना चाहता है कि इसमें क्या है या यह किस विषय से संबंधित है।
इस विषय पर मैं पाठकों से कहना चाहता हूँ कि यह पुस्तक अलग-अलग पाठकों के लिए अलग-अलग अर्थ रख सकती है। एक ही कहानी के दो पाठक अलग-अलग अर्थ निकाल सकते हैं। इसी कारण मैंने इसे कलश की संज्ञा दी है, क्योंकि इसमें से क्या निकलेगा, यह तो आप ही पढ़ने के बाद जान पाएंगे। हाँ, इतना निश्चित रूप से कह सकता हूँ कि इसमें से कुछ अच्छा ही निकलेगा।