He started off as an author and journalist, but moved on to be an active writer in the Indian film industry for 7 years. He worked as a drama producer in All India Radio between December 1953 and May 1956. At this point he realised that a regular job would always be a hindrance to his literary life, so he devoted himself to freelance writing.
Often cited as the true literary heir of Premchand, Amritlal Nagar created his own independent and unique identity as a littérateur and is counted as one of the most important and multi-faceted creative writers of Indian literature.
सात घूंघट वाला मुखड़ा अमृतलाल नागर द्वारा रचित एक स्त्री पर आधरित उपन्यास है। ये उपन्यास मूलतः बेगम समरू के जीवन चरित्र पर आधारित है जो एक कश्मीर सौदागर की ख़ूबसूरत बेटी है और अपने रियासत की मल्लिका बनने के ख़्वाब पिरोती है।
इस उपन्यास के केंद्र में बेगम समरू हैं जिन्हें मुन्नी, दिलाराम और जुआना के नाम से भी संबोधित किया गया है। बेगम समरू के अतिरिक्त बशीर खाँ, लवसूल, जनरल वाल्टर रेनहार्ट ( नवाब समरू ), सिपहसलार टॉमस भी बहुत महत्वपूर्ण किरदार के रूप में उजाकर होते हैं।
उपन्यास की कहानी इतनी सी है कि एक बेगम अपने पति जनरल वाल्टर रेनहार्ट के दिल पर काबू कर लेती है और हिंदुस्तान की मल्लिका बनने के ख़्वाब पिरोने लगती है। सारी रियासत को यक़ीन दिला बैठती है कि उसका जन्म हुक़ूमत करने के लिए हुआ है और वो अपनी प्रजा की रक्षा कर पाने में सक्षम है। मगर इस यक़ीन का बीच अंकुरित करने वाला शख़्स कोई और नहीं बशीर खाँ ही तो है - भले उसने सिर्फ़ दस हज़ार अशर्फियों में मुन्नी को नवाब समरू के हाथों बेच दिया लेकिन उसने साफ़ साफ़ ये भी कहा कि
"फिर वही दस हज़ार? दस हज़ार अशर्फियों की बिसात ही क्या है, बहुत-सा हिस्सा तो यह टॉमस और समरू के खज़ांची-दीवान ही चट कर जाएँगे। जो थोड़ी-बहुत रकम बाकी बचेगी, वह यूँ समझो कि तुम्हें पढ़ाने-लिखाने और होशियार करने में अब्बा ने जो खर्च किया था उसकी भरपाई किसी हद तक हो जाएगी। तुम्हें बेचकर हमें कोई मुनाफा थोड़े ही हुआ है। मगर तुम अपना मुनाफा क्यों नहीं देखती हो। लाखों के जेवरात, बेशुमार पोशाकें, सैकड़ों गुलाम-बाँदियाँ, मेरठ के एक मामूली हैसियत वाले कश्मीरी सौदागर की बेटी को, जिसकी किस्मत में लिखा तो था किसी नाचनेवाली के घर में जाना, मगर जिसे एक लामिसाल शानदार आशिक ने किस्मत से लड़कर मलिका बना दिया। तुम पर यह मेरा एहसान क्या कुछ कम है!"
बशीर खाँ जानता था कि मुन्नी का जन्म दिल्ली की गद्दी पर बैठने के लिए हुआ है, वो एक मिशाल के दौर पर लोगों के मस्तिष्क पर अंकित हो जाएगी तथा अपने विवेक और साहस से वो कर सकेगी जो बड़े से बड़े राजा महाराजा नहीं कर पाते हैं।
अब कहानी के विस्तार पर न जा कर बात करते हैं कि क्यों इस उपन्यास को पढ़ा जाना चाहिए और क्या ख़ास बात इसमें उभरकर सामने आती है ?
१) अमृतलाल नागर की सबसे बड़ी विशेषता रही है उनका प्रचुर साहित्य। प्रसिद्ध इतिहास के किरदारों में कल्पना के रंग भरकर उन्हें वर्तमान समय में पाठकों के समक्ष रख पाने का साहस और उससे भविष्य की आधारभूमि बना सकने की कला उनमें कूट कूट के भरी थी। इसके प्रमाण हैं सात घूंघट वाला मुखड़ा, महाकाल, और मानस के हंस।
२) अगर आप मुझसे पूछेंगे तो मैं ये कहने में तनिक संकोच नहीं करूँगा कि उनका भाषा संसार बहुत बड़ा है। हिंदी की जड़े जाने वाली हिंदी की बोलियों को साहित्य के पटल पर जिस तरह अमृतलाल नागर ला कर स्थापित करते हैं मुझे नहीं लगता है कि कोई और ऐसा कर सकता है या फिर किसी ने किया है। आप सब एक बात याद रखें कि अमृतलाल नागर प्रेमचंद की परम्परा के रचनाकार हैं और उनके पात्र उपन्यासकार की भाषा नहीं बल्कि जिस परिवेश में होते हैं वहाँ की बोली बोलते हैं।
उदहारण - सात घूंघट वाला मुखड़ा में आपको भारी मात्रा में उर्दू शब्दों का उपयोग देखने को मिलेगा। दीदा-औ-दानिस्ता, शौहर, तख्तोताज, अख्तियार जैसे काफ़ी उर्दू और अरबी शब्दों का इस्तेमाल देखने को मिलेगा।
३) इस उपन्यास में आप एक स्त्री के मन के कपट से रूबरू हो सकेंगे। बदले की भावना से ओतप्रोत बेगम समरू किस तरह जनरल वाल्टर रेनहार्ट को कमज़ोर कर छोड़ती हैं, उनकी पहली पत्नी उर्फ़ मुश्तरी को दीवारों में चुनवा कर मार डालती है तथा दिल्ली की गद्दी तक पहुँचना उसके जीवन का एक लक्ष्य बन जाता है और उसके लिए रिश्ते मात्र रिश्ते नहीं होते बल्कि सियासत की बिसात पर खड़े मोहरे भर रह जाते हैं। एक ही समय में तीन अलग अलग लोगों के प्रेम में पड़ना क्रमशः बशीर ख़ाँ, टॉमस और लववसूल तथा सब को अपनी उँगलियों पर नचाना - एक स्त्री अगर ठान ले तो क्या नहीं कर सकती है और किस शय को नहीं खरीद सकती है इसका शश्क्त उदाहरण है सात घूंघट वाला मुखड़ा।
४) इस कहानी की सबसे रोचक बात ये है कि कहीं पर भी कहानी में मनोरंजन की कमी नहीं दिखेगी। ये कहानी बढ़ते पृष्ठ के साथ रोचक होती जाती है और पाठक को पूर्ण रूप से अपने वश में कर लेती है। कथाकार के रूप में अमृतलालनागर चतुर और चालाक लड़की के संवादों को बहुत ही सरल रूप से पेश करते हैं - दृश्यों का वर्णन करने की अद्भुत क्षमता और कहानी को कड़ी में बांधे रखना उन्हें के महान उपन्यासकार के रूप में प्रतिष्ठित करता है।
उदाहरण के रूप में देखें - जब मुश्तरी को दीवार में चुनवाया जा रहा था तब उसने बेगम समरू पर झूठा होने का आरोप लगाया
[ मुश्तरी की ज़बान से एक चीख दबाते-दबाते भी निकल ही गई। लेकिन मुश्तरी घमंड और शान से बोली, "यह हौसला भी निकाल लो जुआना। किसी लैला, किसी शीरीं को इश्क में आज तक क्या मरते दम तक चैन मिला है जो मुझे ही मिले! जलाओ मेरी ज़बान। मैं तब तक चिल्ला-चिल्लाकर कहूँगी कि मुझे नवाब समरू की दौलत से नहीं बल्कि उनसे इश्क है, उनसे इश्क है, उनसे..." "मक्कारा, मरते वक्त तो सच बोला होता।" "मक्कारा तू है जुआना। तुझे नवाब साहब की दौलत से इश्क था, मुझे उनसे। तूने उन्हें बस में करने के लिए ईसाई मज़हब कबूल किया था और मैं उनकी पाक मुहब्बत में हज़रत ईसा की तरह अपनी जान कुर्बान कर रही हूं।"]
जो कि सभी घटनाओं को देखते हुए सही भी लगता है लेकिन उसकी जड़ तक जाने के रोमांच में पाठक कहानी से और अधिक जुड़ाव महसूस करता है। ऐसी अनेक छोटी छोटी और रोचक घटनाओं का सही समय पर उपन्यास में प्रकट होना उसे एक प्रवाह देने का काम करता है।
५) राजनीति और सत्ता को केंद्र पर रख कर लिखा गया ये उपन्यास पाठक को रिश्तों, भावनाओं, प्रेम, फ़रेब और जुनून के मायनों पर विचार करने के लिए विवश कर देता है। क्यों बशीर ख़ाँ दस हज़ार अशर्फियों में मुन्नी का सौदा करने के पश्चात भी उसे देखने जाता है, उसके यहाँ लवसूल को काम दिलाता है तथा अंत तक उसकी सेवा में उपस्थित रहता है। ये सिर्फ़ एक राजनीतिक सौदा है या प्रेम ? क्यों लववसूल आत्महत्या कर बैठता है ? क्यों सब कुछ जीतने वाली बेगम समरू सब कुछ हार जातीं है ?