कभी आपने गीता में कृष्ण की आवाज़ को ध्या न से सुना हो तो वे ‘यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भ लानिर्भवति ’ की बात करते हैं। धर्म की ग्लानि की। ग्लानि अपनी गि रेबान में झांकने पर होती है। उसकी नोक भीतर की ओर मुड़ी रहती है।निष्ठा हो तो सावि त्री की तरह जिसने कहा था: धर्मार्ज र्मार्जर्मार्ज ने सुरश्रेष्ठरेष्ठ कुतो ग्लानिक्ल मस्त था। कि धर्म के अर्ज न में कौनसी ग्लानि और कैसा कष्ट।लेकि न धर्मार्ज र्मार्जर्मार्ज न कि समें है, कई बार यह आत्म -समीक्षा कर ही लेना चाहिए। जो लोग रुद्र के प्रकट होने पर भाग खड़े हों, वे रुद्राक्ष के लि ए बड़े पगलाये दि खते हैं। रुद्र को देखने की आँख ही रुद्राक्ष है। रुद्र+अक्ष । यों तो लूथर के समय चर्च र्च के प्री स्ट स्वर्ग के टि कट भी बेचा करते थे। मुफ़्त ख़ो री सि ख