भगवतीचरण वर्मा रचित उपन्यास रेखा एक ऐसा उपन्यास है जो कि एकदम अलग है। वासना एक ऐसा विषय रहा है जिसपर लिखना अपने आप में दोधारी तलवार है। यह विषय इतना विवादित है कि इस विषय पर लिखते हुए कब आप अश्लील हो जाएंगे यह आपको भी पता नहीं चलेगा। इसलिए रेखा के लिए वर्मा जी बधाई के पात्र है जो इस तरह के विषय पर गंभीर मनोविश्लेषण के जरिये एक मन को समझने की कोशिश करते है। उपन्यास में इतना कुछ है कि इसे चंद लाइनों में समेटना बहुत ही कठिन कार्य है। रेखा अपने परिवार के विरोध में जाकर अपने पसंद से दोगुने उम्र के विदुर प्रोफेसर से विवाह करती है। दर्शनशास्त्र के विष्वविख्यात प्रोफेसर शंकर के अपने काम में डूबे रहते है।विवाह के कुछ समय बाद रेखा का बार बार अन्य पुरुषो से संबंध बनता है।
यह उपन्यास आधुनिक भारतीय नारी के जीवन से संबंधित कई गंभीर प्रश्न पूछता है। एक ऐसी नारी जो कि अपने पति से न सिर्फ प्रेम करती है बल्कि देवता की तरह पूजा करती है कैसे अपने तन भूख से पीड़ित होकर बार बार गलत कदम उठाती है? सही और गलत के बीच जूझती हुई रेखा के सहारे उपन्यास बार बार आगे बढ़ता जाता है। प्रथम बार जब रेखा पर पुरुष पर आकर्षित होती है तो मन में गंभीर सवाल उठते है -
पुस्तक के अंश -1
उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि यह सब क्या हो रहा है और क्यों हो रहा है। आत्मा से पृथक शरीर का भी कोई अस्तित्व है ? प्रथम बार यह प्रश्न रेखा के सामने एक असह्य पीड़ा और दुश्चिन्ता बनकर खड़ा हो गया।
एक भयानक द्वंद मचा हुआ था उसमें, भावना और बुद्धि का असह्य संघर्ष चल रहा था, जिसमें रेखा डूबती चली जा रही थी। भावना पर बुद्धि विजय पाती चली जा रही थी।
आदमी झूठे सच्चे विश्वासों पर ही तो कायम है। इन विश्वासों को तोड़ने का अर्थ है , अपने अस्तित्व को चुनौती देना।
पूरे उपन्यास के दौरान रेखा का मानसिक संघर्ष बना रहता है तो दूसरी ओर दर्शनशास्त्र के द्वारा जीवन और इस फंसे हुए हलात पर कई तात्विक प्रश्न पूछे जाते है। ज्यादातर हिस्सा कहानी में ही बीतता है पर जहाँ कहीं भी जीवन का विश्लेषण है वो अद्भुत है। एक साहित्यिक पाठक को मंत्र मुग्ध कर देने वाली लेखनी।
पुस्तक के अंश - 2
कुरूपता ! जीवन में कहीं कुरूपता का भी एक अनिवार्य और महत्वपूर्ण स्थान है; इस कुरूपता से त्राण पाना असंभव है। इस कुरूपता से मोह कैसे मोड़ा जा सकता है ? और इसलिए कुरूपता से समझौता करके उसका अभ्यस्त हो जाना ही श्रेयकर होगा उसके लिए।
जीवन का धर्म है जागृति और कर्म ! निष्क्रियता और शयन ये भी इस जीवन में मौजूद है , लेकिन पूरक तत्त्व के रूप में।
उपन्यास में बहुत सारे पात्र अलग तरह की मान्यता लिए हुए होते है जिससे उपन्यास की रोचकता बनी हुई रहती है। उपन्यास इस तरह लिखा गया है की इसे खत्म करने के बाद भी ऐसा लगता है जैसे कुछ अधूरा है। क्या होता है रेखा के जीवन में ? क्या रेखा अपने तन और मन के संघर्ष में कोई रास्ता निकाल पाती है ? क्या सही होगा रेखा के लिए अपने बूढ़े पति को छोड़ देना या फिर उसे भुलावे में रखना ?
Is book me phli bar muje smaaj k, humans k bare m ek alag he pehlu dekhne ko mila. "Kya ye b hmari dunia ka ek sach hai?" Maine asa he feel kia is kitab me. Insan ko sch m sochne pr majboor kr de ye book.Ek bhayawah sach, ek aaina h ye .