जनार्दन मोदी अपने बिजनेस के लिए सस्ते भाव से जमीन खरीदने के लिए गांव में बहुरूपिया बनकर स्थापित हो गया । फिर उसने भोले-भाले गांव वालों के बीच में उनका हमराज बनकर, उनके साथ चौपाल में हुक्का गुड़गुड़ाकर, उनका विश्वास जीत कर अनेक गांव वालों को अपनी जमीन बेचने को राजी कर लिया । लेकिन फिर एक शाम जब उसका राज खुला तो अगले रोज बंद केबिन में से उसकी लाश ही बरामद हुई ।
Surender Mohan Pathak, is an author of Hindi-language crime fiction with 314 books to his credit. His major characters are Crime reporter Sunil (unprecedented 123 Titles), Vimal (46 Titles) and Philosopher Detective Sudhir (23 titles). Apart from series, he has written 60+ Novels in thriller category.
"ताज़ा खबर" कहानी है एक ऐसे व्यवसायी जनार्दन मोदी की जो नेमचंद बन कर झेरी से ५ की.मी. दूर एक गाँव के लोगों की ज़मीन धोखेबाजी से खरीद रहा है और वहां एक गोल्फ कोर्स बनवाना चाहता है। इस बात खबर है सिर्फ और सिर्फ उसके अकाउंटेंट प्रभात सक्सेना को जो जुए का शौक़ीन है और कंपनी का पैसा गबन करके भी जुए में हार गया है। वह जनार्दन मोदी के गुप्त कार्य के बारे में अपनी महिला मित्र नताशा मदन को बता देता है।
व्यवसायी सुदर्शन तलवार, गबन के गुप्त रहस्य का पता लगा कर प्रभात सक्सेना को ब्लैकमेल करता है ताकि वह यह बता दे की आजकल जनार्दन मोदी कहाँ है और क्या कर रहा है। प्रभात सक्सेना मजबूरी में यह बात उसे बता देता है।
जनार्दन मोदी के निजी सचिव के पास एक डिटेक्टिव एजेंसी से पार्सल आता है जिसमे जनार्दन मोदी की पत्नी और जनार्दन मोदी का दोस्त अनिल मेहरा अन्तरंग अवस्था में होते हैं। नम्रता कोहली तस्वीर देख लेती है। लेकिन निशा मोदी अपनी चालाकी से वह पार्सल नम्रता कोहली से चुरा लेती है।
हुकुमचंद थालिया उसी गाँव का एक किसान है जहाँ जनार्दन मोदी जमीने खरीद रहा है। जनार्दन मोदी ने थालिय का ज़मीन भी हथिया लिया है। थलिया अपने एक पत्रकार दोस्त जवाहर के द्वारा मोदी के खिलाफ आवाज उठाना चाहता है।
सुनील, ब्लास्ट के मुख्या खोजी पत्रकार और उसका सहायक पत्रकार अर्जुन इस गाँव में प्रवेश करते हैं और वे जनार्दन मोदी का इंटरव्यू लेना चाहते हैं। लेकिन उन्हें उसकी खबर नहीं लगती। सुनील, जवाहर से भी उसको खोजने में सहायता मांगता है।
थलिया को सुदर्शन तलवार से खबर मिलती है की नेमचंद ही जनार्दन मोदी है। थलिया, जवाहर के साथ नेमचंद की कोठी पर जाता है ताकि उसे सबक सिखा सके। लेकिन जनार्दन मोदी उन दोनों से नहीं मिलता और दरवाजे खिड़कियाँ बंद करके छुप जाता है।
अगले दिन अर्जुन को भी इस बात की खबर लग जाती है की नेमचंद ही जनार्दन मोदी है इसलिए इंटरव्यू की तमन्ना लिए सुनील और अर्जुन नेमचंद की कोठी पर पहुँचते हैं जहाँ उन्हें पुलिस मिलती है जो उन्हें बताती है की नेमचंद उर्फ़ जनार्दन मोदी ने आत्महत्या कर ली है।
सुनील पुलिस दस्ते के मुख्य अधिकारी सब इंस्पेक्टर कृपाराम को अखबार में फोटो छपवाने का लालच देकर घटना स्थल का मुआयना करता है। सुनील को वहां एक १/३ जली हुई मोमबत्ती, एक अखबारों से बना सुसाइड नोट और महिलाओं के प्रयोग में आने वाला शीशा सबूतों के तौर पर मिलता है। शीशे के पीछे NM लिखा हुआ था। सुनील इस बात को नकारता है की जनार्दन मोदी ने आत्महत्या की है और सुसाइड नोट की धज्जियाँ उड़ा देता है।
सुनील को जवाहर और थलिया यह भी बताते हैं की कल शाम को उन्होंने मोदी को इसी कमरे में जिंदा देखा था।
आगे पुलिस और सुनील अपनी तहकीकात को आगे बढ़ाते हैं। सुनील अपनी तहकीकात में नताशा मदान, प्रभात सक्सेना, सुदर्शन तलवार, निशा मोदी, अनिल मेहरा सब से मिलता है असली कातिल को पकड़ने के लिए एक जाल बिछाता है।
पाठक साहब ने सभी प्रमुख किरदारों को टुकडो टुकडो में एक के बाद एक परत दर परत हमसे मिलवाया। फिर कहानी आगे बढती है जहाँ एक खून हो जाता है और सबूतों के नाम पर बस २ लोगो की गवाही, एक मोमबत्ती, एक अखबार के शब्दों से बना Sucide नोट , एक लड़कियों के प्रयोग वाला शीशा। सुनील के द्वारा मोमबत्ती से सम्बंधित टाइम फैक्टर को समझाना शानदार लगता है। सुनील ने बहुत ही खूबी से कृपा राम के Sucide नोट की धज्जियां उड़ाई। मुझे तो तब बहुत हंसी आई जब नताशा और प्रभात एक दुसरे को कातिल समझ रहे थे और निशा - अनिल मेहरा एक दुसरे को कातिल समझ रहे थे। एक क़त्ल हुआ था और इतने सारे Suspect थे। एक बहुत ही सुन्दर रहस्य को सुनील बड़े ही मजाकिया ढंग से हल कर दिखाया। रमाकांत और प्रभुदयाल की कमी बहुत खली इस उपन्यास में। वही कृपाराम का किरदार भी बहुत ही सुन्दर था। उपन्यास का प्लाट बहुत ही सिमित था । पाठक सर ने बहुत ही सिमित प्लाट में भी बहुत सुन्दर मर्डर मिस्ट्री पेश कर दी थी। सुनील द्वारा पेश किया गया इस उपन्यास का अंत बहुत ही शानदार है। उपन्यास में नताशा मदान और नम्रता कोहली का किरदार बहुत ही ऊँचे स्तर का लगता है । और निशा मोदी के किरदार का स्तर बहुत छोटा रखा। ये बातें इस उपन्यास के बहुत ही जरूरी थी। हुकुम चंद थालिया का किरदार सच में दिल को छु लेने वाला है। एक किसान की ज़मीन जब छिनती है वो भी किसी होटल प्रोजेक्ट के लिए या हाईवे प्रोजेक्ट के लिए या बिल्डिंग प्रोजेक्ट के लिए तो उस किसान को बड़ा दर्द होता है। जो भूलवश ज़मीन बेच चुके होते हैं वो बाद में पछताते हैं। आज भी ऐसा ही कुछ रोज कही न कही भारत में हो ही रहा है। मैं पाठको को सलाह दूंगा की जिन्होंने इसे नहीं पढ़ा वो एक बार जरूर पढ़े और जिन्होंने पढ़ रखा है वो इसे दुबारा पढ़ें......