गिरधारीलाल राजनगर का एक जाना-माना रईस था जो कि कभी-कभार जुआ खेलने में कोई हर्ज नहीं मानता था । परन्तु आजकल उसके पत्ते ऐसे पड़ रहे थे कि वो रोज हारता था । उसकी खूबसूरत जवान बीवी का मानना था कि उस खेल में बेईमानी हो रही थी जिसे पकड़ने के लिये उसने ब्लास्ट के स्पेशल संवाददाता सुनील चक्रवर्ती से मदद मांगी । और फिर सुनील की टांग उस मामले में ऐसी फंसी कि साधारण जुए का खेल खून का खेल बन गया ।
Surender Mohan Pathak, is an author of Hindi-language crime fiction with 314 books to his credit. His major characters are Crime reporter Sunil (unprecedented 123 Titles), Vimal (46 Titles) and Philosopher Detective Sudhir (23 titles). Apart from series, he has written 60+ Novels in thriller category.
“खबर में तो कोई दम नहीं है । लेकिन ताश के जुए में होने वाली स्टैण्डर्ड बेईमानियों पर शायद हम अपने अखबार के रविवार को प्रकाशित होने वाली मैगजीन सैक्शन में एक लेख छापें । लेख में इलस्ट्रेशन के तौर पर यह पाइप और यह ताश बहुत काम आयेगी ।” “उसमें किसी भी सन्दर्भ में मेरा जिक्र नहीं आना चाहिए ।” “बेहतर ।” “अगर गया तो मैं तुम लोगों पर मानहानि का मुकद्दमा दायर कर दूंगा । मैं तुम्हारा अखबार बन्द करवा दूंगा । मुझे कोई मामूली आदमी मत समझना । मेरी बहुत ऊपर तक पहुंच है ।” “कितनी ऊपर तक ?” “चीफ मिनिस्टर तक मेरे साथ बैठकर चाय पीते हैं ।” “मेरी बहुत ऊपर तक पहुंच है” - सुनील ने धीरे से वह वाक्य दोहराया - “गिरधारीलाल जी यह फिकरा मैं इतनी बार सुन चुका हूं और पहुंच की ऊंचाईयों का जिक्र सुन चुका हूं कि मुझे पूरा विश्वास है कि एक न एक दिन मुझे कोई आप जैसा रुतबे और दौलत का अभिमानी ऐसा व्यक्ति जरूर मिलेगा, जिसकी सबसे ऊपर तक पहुंच होगी । जो भगवान के साथ हाथ मिलाता होगा, ईसामसीह के साथ चाय पीता होगा और अल्लाताला के साथ कबड्डी खेलता होगा ।” गिरधारीलाल के चेहरे ने कई रंग बदले । “और गिरधारीलाल जी, पूर्व स्थापित सामाजिक मापदण्डों के लिहाज से शायद मैं आपके मुकाबले का आदमी नहीं लेकिन मेरी भी बहुत ऊपर तक पहुंच है । मैं भी बहुत बड़ी-बड़ी हस्तियों से वाकिफ हूं । जिन हस्तियों तक आपकी पहुंच है वे डावांडोल होती रहती हैं । लेकिन जिन हस्तियों की मुझ पर कृपादृष्टि है उनका सिंहासन कभी नहीं डोलता, वे कभी किसी इलैक्शन में हार कर तबाह नहीं हो जातीं, वे तब से सभ्यता और संस्कृति के उस ऊंचे सिंहासन पर बैठी हैं जो जब से सृष्टि बनी है तब से अटल हैं ।” “तुम किन हस्तियों की बात कर रहे हो ?” “उन्हीं हस्तियों की जिन तक कि मेरी पहुंच है । जो आपकी बहुत ऊपर वाली बहुंच तक से भी बहुत ऊपर हैं । मैं निर्भीकता के साथ हमनिवाला हूं, आत्मविश्वास के साथ हमप्याला हूं, स्पष्टवादिता मेरी हमसफर है और दृढ निश्चय मेरा हमराज और सच ! मेरे साथ बैठकर चाय पीता है ।” “तुम” - गिरधारीलाल आग बबूला हो उठा - “तुम... तुम दो टके के आदमी...” “कल और आज में आपकी दो पैग विस्की पी” - सुनील जेब से एक सौ का नोट निकाल कर गिरधारीलाल के समाने मेज पर उछालता हुआ बोला - “उसकी यह कीमत छोड़े जा रहा हूं । जो रकम बचे उसे टिप समझियेगा । मुझे अफसोस है कि मैंने आप जैसे हल्के आदमी की कोई मदद की ।” “मैं देखूंगा तुम्हें ।” “जरूर देखियेगा । और यह सब कुछ अखबार में छापने का पहले मेरा कोई इरादा नहीं था, लेकिन अब जरूर छापूंगा । आप जो मुझे भून सकते हो, भून लीजियेगा ।” “तुम... तुम...” “नमस्ते, गिरधारीलाल जी ।” सुनील लम्बे डग भरता हुआ वहां से बाहर निकल गया ।
It is a fast paced thriller. Story starts with gambling and ends in high end espionage. A very enjoyable thriller.