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Thrillers #5

गैंगवार

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कहने को वो एक डॉक्टर था लेकिन उसमें किसी मृत शरीर के रूबरू होने तक का हौसला नहीं था । लेकिन गलतफमी में जहां उसे एक लाश का पोस्टमार्टम करने के लिये मजबूर किया जा रहा था, वहीं पोस्टमार्टम हरगिज भी न करने के लिये धमकाया भी जा रहा था । एक बेशकीमती पन्ने की खातिर मची छीना-झपटी की लोमहर्षक कहानी !

Mass Market Paperback

First published December 1, 1977

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52 people want to read

About the author

Surender Mohan Pathak, is an author of Hindi-language crime fiction with 314 books to his credit. His major characters are Crime reporter Sunil (unprecedented 123 Titles), Vimal (46 Titles) and Philosopher Detective Sudhir (23 titles). Apart from series, he has written 60+ Novels in thriller category.

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Displaying 1 - 2 of 2 reviews
Profile Image for Monali Thakur.
6 reviews12 followers
January 18, 2020
काफी पहले पढ़ी थी अच्छी किताब है।
Profile Image for Rajeev Roshan.
71 reviews14 followers
December 12, 2013
सन 1977 के दिसम्बर की ठिठुरती हुई सर्दियों में पाठक साहब ने अपने प्रशंसकों को "गैंगवार" उपन्यास का तोहफा दिया।

यह उपन्यास बहुत ख़ास था पाठकों के लिए भी और खुद पाठक साहब के लिए भी।

पाठक साहब ने इस उपन्यास में अपने अस्थायी किरदार "जुगल किशोर उर्फ़ बन्दर" को केंद्रीकृत करते हुए इस उपन्यास को लिखा जिसकी पृष्ठभूमि विदेशी धरती थी।

डॉ जुगल किशोर उर्फ़ बन्दर, एक मेडिकल सम्मलेन में भाग लेने के लिए विदेशी धरती पर उतरते हैं। अपनी आदत से मजबूर लड़कियों के जाल में आसानी से फंस जाने वाले इस मजनू को यह विदेशी धरती कुछ ख़ास तब रास नहीं आती जब कुछ व्यक्ति डॉ जुगलकिशोर को एक गैरकानूनी पोस्ट-मोर्टेम करने को कहते हैं।

अब भला डॉ जुगल किशोर उर्फ़ बन्दर जिन्होंने कभी कॉलेज के दरवाजे से आगे का रास्ता तय नहीं किया था और जिसने MBBS की परीक्षा पास करने में कॉलेज के छक्के छुरा दिए, भला वो पोस्ट-मोर्तेम कैसे करता।

दोस्तों बन्दर महाशय ऐसे गैंग के चंगुल में फंस जाता है जो उसका पीछा छोड़ने को तैयार ही नहीं।
वही फिर एक और गैंग का अस्तित्व इस कहानी में उभर आता है।
और फिर शुरू होती है "गैंगवार" जिसमे खामखाह बन्दर फंस जाता है। या यूँ कह लीजिये ये दो बिल्ली सरीखे गैंग के बीच बन्दर फंस जाता है। जैसा की दो बिल्ली और बन्दर की कहावत में, अंत में बन्दर ही बाजी मार ले जाता है। वैसे ही बन्दर भी आखिरकार बाजी मार ही जाता है।
दोस्तों, इस उपन्यास में बन्दर की जान पर बन आती है तो वह जैकी चैन के भी अंदाज़ को फ़ैलकर देता है।

रहस्य और रोमांच के साथ तीसरा डोज "बन्दर" से मिले-जुले इस उपन्यास को पाठक साहब और उनके प्रशंसक, पता नहीं कैसा आंकते हैं। लेकिन मैं तो यह जरूर कहूँगा की किसी फाइट-एक्शन या क्राइम थ्रिलर हॉलीवुड मूवी से अच्छा, मैं यह उपन्यास निकाल कर पढ़ लूँ।

तो अगर आप, कुछ बदलाव चाहते हैं तो जरूर इस उपन्यास को अपने खजाने से निकालिए और पढ़ डालिए।

आभार
राजीव रोशन
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