Jump to ratings and reviews
Rate this book

तिन पहाड़

Rate this book
तीन पहाड़ ‘साँझ की उदास-उदास बाँहें अँधिआरे से आ लिपटीं। मोहभरी अलसाई आँखें झुक-झुक आईं और हरियाली के बिखरे आँचल में पत्थरों के पहाड़ उभर आए। चौंककर तपन ने बाहर झाँका। परछाई का सा सूना स्टेशन, दूर जातीं रेल की पटरियाँ और सिर डाले पेड़ों के उदास साए। पीली पाटी पर काले अक्खर चमके ‘तिन-पहाड़,’ और झटका खा गाड़ी प्लेटफॉर्म पर आ रुकी।’ इन्हीं वाक्यों के साथ नियति की यह कथा खुलती है। जया, तपन, श्री, एडना जिसके अलग-अलग छोर हैं। झील के अलग-अलग किनारे जिस तरह उसके पानी से जुड़े रहते हैं, उसी तरह आकांक्षा के भाव में एक साथ बँधे। आकांक्षा सुख की, चाह की, प्रेम की। ‘दार्जिलिंग के नीले निथरे आकाश,’ लाल छतों की थिगलियों, ‘पहरुओं से खड़े राजबाड़ी के ऊँचे पेड़ों,’ चक्करदार ‘सँकरी घुमावोंवाली चढ़ाइयों-उतराइयों,’ ‘हवाघर की बेंचों,‘ और गहरे उदास अँधेरों के बीच घूमती यह कथा जिन्दगी के अँधेरों-उजालों के बारे में तो बताती ही है, एक भीने यात्रा-वृत्तान्त का भी अहसास जगाती है। लेकिन इस उदास ‘नोट’ के साथ - ‘जिसकी साड़ी का टुकड़ा भर ही बच सका, वह इन सबकी क्या होती होगी...क्या होती होगी।’

91 pages, Hardcover

Published January 1, 2004

2 people are currently reading
26 people want to read

About the author

कृष्णा सोबती (१८ फ़रवरी १९२५, गुजरात (अब पाकिस्तान में)) हिन्दी की कल्पितार्थ (फिक्शन) एवं निबन्ध लेखिका हैं। उन्हें १९८० में साहित्य अकादमी पुरस्कार तथा १९९६ में साहित्य अकादमी अध्येतावृत्ति से सम्मानित किया गया था। अपनी संयमित अभिव्यक्ति और सुथरी रचनात्मकता के लिए जानी जाती हैं। उन्होंने हिंदी की कथा भाषा को विलक्षण ताज़गी़ दी है। उनके भाषा संस्कार के घनत्व, जीवन्त प्रांजलता और संप्रेषण ने हमारे समय के कई पेचीदा सत्य उजागर किए हैं।

कृष्णा सोबती का जन्म गुजरात में 18 फरवरी 1925 को हुआ था। विभाजन के बाद वे दिल्ली में आकर बस गईं और तब से यही रहकर साहित्य सेवा कर रही हैं। उन्हें 1980 में 'जिन्दी नामा' के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था। 1996 में उन्हें साहित्य अकादमी का फेलो बनाया गया जो अकादमी का सर्वोच्च सम्मान है। 2017 में इन्हें भारतीय साहित्य के सर्वोच्च सम्मान "ज्ञानपीठ पुरस्कार" से सम्मानित किया गया है। ये फिक्शन की लेखक हैं।

कार्यक्षेत्र

‘बादलों के घेरे’, ‘डार से बिछुड़ी’, ‘तीन पहाड़’ एवं ‘मित्रो मरजानी’ कहानी संग्रहों में कृष्णा सोबती ने नारी को अश्लीलता की कुंठित राष्ट्र को अभिभूत कर सकने में सक्षम अपसंस्कृति के बल-संबल के साथ ऐसा उभारा है कि साधारण पाठक हतप्रभ तक हो सकता है। ‘सिक्का बदल गया’, ‘बदली बरस गई’ जैसी कहानियाँ भी तेज़ी-तुर्शी में पीछे नहीं। उनकी हिम्मत की दाद देने वालों में अंग्रेज़ी की अश्लीलता के स्पर्श से उत्तेजित सामान्यजन पत्रकारिता एवं मांसलता से प्रतप्त त्वरित लेखन के आचार्य खुशवंत सिंह तक ने सराहा है। पंजाबी कथाकार मूलस्थानों की परिस्थितियों के कारण संस्कारत: मुस्लिम-अभिभूत रहे हैं। दूसरे, हिन्दू-निन्दा नेहरू से अर्जुन सिंह तक बड़े-छोटे नेताओं को प्रभावित करने का लाभप्रद-फलप्रद उपादान भी रही है। नामवर सिंह ने, कृष्णा सोबती के उपन्यास ‘डार से बिछुड़ी’ और ‘मित्रो मरजानी’ का उल्लेख मात्र किया है और सोबती को उन उपन्यासकारों की पंक्ति में गिनाया है, जिनकी रचनाओं में कहीं वैयक्तिक तो कहीं पारिवारिक-सामाजिक विषमताओं का प्रखर विरोध मिलता है। इन सभी के बावजूद ऐसे समीक्षकों की भी कमी नहीं है, जिन्होंने ‘ज़िन्दगीनामा’ की पर्याप्त प्रशंसा की है। डॉ. देवराज उपाध्याय के अनुसार-‘यदि किसी को पंजाब प्रदेश की संस्कृति, रहन-सहन, चाल-ढाल, रीति-रिवाज की जानकारी प्राप्त करनी हो, इतिहास की बात’ जाननी हो, वहाँ की दन्त कथाओं, प्रचलित लोकोक्तियों तथा 18वीं, 19वीं शताब्दी की प्रवृत्तियों से अवगत होने की इच्छा हो, तो ‘ज़िन्दगीनामा’ से अन्यत्र जाने की ज़रूरत नहीं।

पाठकों की कथाकार

उनकी लंबी कहानी ‘मित्रो मरजानी’ के प्रकाशन के साथ कृष्णा सोबती पर हिंदी कथा-साहित्य के पाठक फ़िदा हो उठे थे. ऐसा इसलिए नहीं हुआ था कि वे साहित्य और देह के वर्जित प्रदेश की यात्रा की ओर निकल पड़ी थीं बल्कि उनकी महिलाएं ऐसी थीं जो कस्बों और शहरों में दिख तो रही थीं, लेकिन जिनका नाम लेने से लोग डरते थे.

यह मजबूत और प्यार करने वाली महिलाएं थीं जिनसे आज़ादी के बाद के भारत में एक खास किस्म की नेहरूवियन नैतिकता से घिरे पढ़े-लिखे लोगों को डर लगता था. कृष्णा सोबती का कथा साहित्य उन्हें इस भय से मुक्त कर रहा था.

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में पढ़ाई कर रहे अंकेश मद्धेशिया कहते हैं, ‘उन की नायिकाएं अपने प्रेम और अपने शरीर की जरूरतों के प्रति किसी भी तरह के संकोच या अपराधबोध में पड़ने वाली नहीं थीं. आज तो यौन जीवन के अनुभवों पर बहुत सी कहानियां लिखी जा रही हैं पर आज से चार-पांच दशक पहले इस तरह का लेखन बहुत ही साहसिक कदम था.’

वास्तव में कथाकार अपने विषय और उससे बर्ताव में न केवल अपने आपको मुक्त करता है, बल्कि वह पाठकों की मुक्ति का भी कारण बनता है. उन्हें पढ़कर हिंदी का वह पाठक जिसने किसी हिंदी विभाग में पढ़ाई नहीं की थी लेकिन अपने चारों तरफ हो रहे बदलावों को समझना चाहता था.

वह चाहता था कि वह सब कुछ कह दे जो ‘बादलों के घेरे में’ कहानी का नैरेटर मन्नू से कहना चाहता था. अपने मन में बस रही एक समानांतर दुनिया से मुक्ति के लिए कृष्णा सोबती की कहानियां मन में धंस जाती थीं.

विवाद

इनकी कहानियों को लेकर काफ़ी विवाद हुआ। विवाद का कारण इनकी मांसलता है। स्त्री होकर ऐसा साहसी लेखन करना सभी लेखिकाओं के लिए सम्भव नहीं है। डॉ. रामप्रसाद मिश्र ने कृष्णा सोबती की चर्चा करते हुए दो टूक शब्दों में लिखा है: उनके ‘ज़िन्दगीनामा’ जैसे उपन्यास और ‘मित्रो मरजानी’ जैसे कहानी संग्रहों में मांसलता को भारी उभार दिया गया है। केशव प्रसाद मिश्र जैसे आधे-अधूरे सैक्सी कहानीकार भी कोसों पीछे छूट गए। बात यह है कि साधारण शरीर की ‘अकेली’ क

Ratings & Reviews

What do you think?
Rate this book

Friends & Following

Create a free account to discover what your friends think of this book!

Community Reviews

5 stars
3 (18%)
4 stars
8 (50%)
3 stars
3 (18%)
2 stars
2 (12%)
1 star
0 (0%)
Displaying 1 - 4 of 4 reviews
Profile Image for विकास 'अंजान'.
Author 9 books44 followers
June 5, 2020
3.5/5
'तिन पहाड़' कृष्णा सोबती जी द्वारा लिखा गया एक लघु-उपन्यास है। यह लघु-उपन्यास पहली बार 1968 में प्रकाशित हुआ था।
किताब आपको बाँधे रखती है। भाषा खूबसूरत है और आपका मन मोह देती हैं। किरदार रोचक हैं और आप उनसे जुड़ाव महसूस करते हो।
किताब के विषय में मेरी विस्तृत विचार आप निम्न लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं:
तिन पहाड़
9 reviews
March 25, 2024
जंगल के सहारे खड़े दोनों बड़े नामवाले विक्टोरिया फाल्स के छोटे दर्शनों पर हंसते रहे। तब नीचे बैठ जया ने तपन के हाथ से अपनी जूती ले ली। पांव में डालते हुए कहा-
"जितने कोस इन्हें उठाए रहे हैं उतने जन्मों में भी इसका ऋण नहीं उतार पाऊंगी।"
तपन उलाहने से देखते रहे...
"जिसे अपना सौभाग्य मानता हूं, उसे ऋण करके पुकारेंगी"
"साख से परे जो हो, उससे उऋण तो नहीं ही"
Profile Image for Manish Khurana.
62 reviews14 followers
April 12, 2020
सोबती जी की यह मेरी पहली पुतस्क है| मुझे ये नहीं समझ आता कि इनके लेखन की प्रशंसा किन शब्दों में की जाए| मेरे विचार में जो एक शब्द इस लेखन के साथ न्याय कर सकता है वो होगा - काव्यात्मक!

कहानी स्वयं में उतनी दमदार नहीं लगी, लेकिन एक रहस्य ज़रूर बना रहा और उसी ने लेख को रफ़्तार दी| और लोगों की तरह ही मैं भी यह समझना चाहूंगा कि इसके शीर्षक का महत्त्व क्या है|
Profile Image for Shobhit Saxena.
24 reviews4 followers
August 26, 2021
4
कृष्णा सोबती जी का उपन्यास (उपन्यासिका/लम्बी कहानी/आख्यायिका) "तिन पहाड़" सर्वप्रथम 1968 में प्रकाशित हुआ था. इस उपन्यास में लेखिका ने मानवीय प्रकृति के कुछ विशेष पहलुओं नामतः प्रेम, वासना, विग्रह और धोखा का वर्णन एक यात्रा-वृत्तांत की-सी शैली में किया है.

कृष्णा जी के सजीव लेखन का ही परिणाम है कि कहानी के पात्र तो क्या, परिदृश्य में मौजूद प्राकृतिक सौंदर्य भी मन पर गहरी छाप छोड़ जाता है. मुख्य पात्रों, जया एवं तपन, का चित्रण इतनी गहराई और कुशलता से किया गया है कि वह लम्बे समय तक याद आते हैं . दोनों के बीच का स्नेह, परवाह, प्रेम अत्यंत मनमोहक एवं सरस लगा है.
"अभी...अभी...तारों की लौ हल्की हो मानो मोतियों की लड़ी बन आई. सामने पूर्व में उजाले की लौ फूटी और किसी
अदीखे हाथ ने पहाड़ों पर रोली छिड़क दी. दिन चढ़ गया..सूर्योदय हो गया. "

"बड़े-बड़े डग भर तपन पास आते. जया और तेज़ दौड़तीं. तपन धीमे हो जया को आगे बढ़ने देते, फिर दौड़कर उनसे
जा मिलते. "


कृष्णा जी के लेखन में मानव प्रकृति एवं भावनाओं का अद्वितीय चित्रण मिलता है.

" 'लंच के लिए न आ पाई तो जान लें, सिंगरापोंग की थकन उतारती हूँ.'
तपन ने आँखें नहीं लौटाईं।
'शाम को भी न दिखीं तो...?'
वह अर्थ भरी गंभीर आँखों से उन्हें देखती रहीं...
'जब नहीं दीखूँगी, वह वाली शाम आज नहीं.' "

श्री के चरित्र में काम-वासना के आगे मूल्यों एवं वचनों की विवशता को दर्शाया गया है.
एक ऐसी लड़की, जो कि अपने साथ छल हुए जाने के बाद अपने दोषी के निवेदन को ठुकराने में तनिक नहीं झिझकती, के रूप में जया का चरित्र विनम्र होते हुए भी अद्भुत सशक्त लगता है.
" 'श्री दा ! माँ को लिख दें, मेरा लौटना नहीं होगा. ' श्री अनजाने ही कठोर हो उठे. नितांत अपरिचित तपन की बाँह पर जया का हाथ सह न सकने से उठ खड़े हुए और कठोरता से बोले— 'इतना तो अधिकार रखता हूँ कि पूछ सकूँ.' जया ने आगे की बात नहीं सुनी. संकेत से टोक दिया—'नहीं, श्री दा,नहीं' "

कृष्णा जी की लेखनी का सहारा ले समस्त पहाड़, चायबागान, नदी, पेड़, पुल इत्यादि मानो बोल पड़ते हों. असाधारण लेखन के कारण यह कथा दीर्घकाल तक याद रहेगी, हालांकि कथा के अंत से मुझे शिकायत है.
उपन्यास का शीर्षक "तिन पहाड़" होने का कारण अस्पष्ट है.
Displaying 1 - 4 of 4 reviews

Can't find what you're looking for?

Get help and learn more about the design.