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सूखा पत्ता

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184 pages, Paperback

Published January 1, 2017

68 people want to read

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Amarkant

22 books2 followers

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Displaying 1 - 3 of 3 reviews
Profile Image for विकास 'अंजान'.
Author 9 books44 followers
July 29, 2016
4.5/5
उपन्यास की कहानी सन् 1943 के आसपास शुरू होती है जब कृष्ण नववीं कक्षा में गया था और ये कहानी 1946 तक जाती है जब वो इंटरमीडिएट कर रहा होता है। इस अंतराल को तीन हिस्सों में बाँटा गया जिसमें कृष्ण के जीवन में हुए महत्वपूर्ण बदलाव दर्शाये गये हैं।
पहले खण्ड को पढ़ते हुए मैंने विषाद (नास्टैल्जिया), दूसरे खण्ड को पढ़ते हुए रोमांच और बचपने की मासूमियत और तीसरे खण्ड को पढ़ते हुए पहले प्यार होने का आनंद और उसको खोने का दुःख मैंने अनुभव किया। ऐसे कम ही उपन्यास होते हैं जो इतनी भावनायें एक साथ आपके मन में जगाते हैं। मेरे लिये ये उनमे से एक उपन्यास था।और शायद इसलिए ये मेरे मन के काफी नज़दीक अपनी जगह बना पाया।
मुझे उपन्यास बहुत पसंद आया। मैं तो चाहूँगा आप इसे एक बार अवश्य पढ़ें।
मेरे पूरे विचार आप इधर भी पढ़ सकते हैं :
सूखा पत्ता
Profile Image for Tulsi Garg.
7 reviews2 followers
November 8, 2021
सूखा पत्ता, अमरकांत जी द्वारा रचित एक अद्भुत उपन्यास। इस उपन्यास की गलियों में प्रवेश करते आपको अपने जीवन की झाकियां देखने को मिलते लगेंगी। युवावस्था का जोश,बचपन की स्मृतियां, ह्रदय को द्रवित करने वाली एक सच्चे प्रेम की अधूरी कहानी।
इस उपन्यास में लेखक ने कल्पना का सहारा बहुत कम लिया है,और ये बात स्वयं लेखक ने अपनी कृति के प्रारंभ में कह दी है। "ऐसी रचनाओं में सबसे अधिक डर इसका होता है कि लेखक नायक के व्यक्तित्व पर हावी ना हो जाए, इसलिए मैंने कल्पना का बहुत कम सहारा लिया। वस्तुतः घटनाओं को सजा भर दिया है- जो कुछ परिवर्तन हुआ है वह भाषा और शैली में ही।"
यह उपन्यास अमरकांत जी के किसी मित्र के जीवन पर आधारित है। इसको कृतिकार ने चार भागों में विभक्त किया है - मनोहर,तीन मित्र,उर्मिला, कृपाशंकर।
प्रथम दो भाग में मित्रता का डूबता - उतारता रंग,अपने आप को समाज में एक प्रतिष्ठित व्यक्ति दिखाने की स्वाभाविक चाह,निर्भीक बनने का उतावलापन आदि अनेक बातें अत्यंत स्वाभाविक व सहज लहज़े में लेकिन रोमांचकारिकता के साथ व्यक्त की गईं हैं।
तीसरे भाग में प्रवेश करते ही यह रोमांच एक नए रूप में विस्तार पाता है। "उर्मिला" का जीवन बेहद सरल, सादा व एक सामान्य लड़की का ही है,जिसका प्रेम जाति के बीच पिस जाता है। प्रेम दोनों तरफ से होने पर भी लाछंन लड़की के ही माथे पर लगता है। सदियों से चली आ रही यह व्यवस्था,जो आज भी संकुचित मानसिकता वाले व्यक्ति के दिमाग में पैर पसारे बैठी हुई है,का लेखक ने बहुत स्वाभाविक वर्णन किया है।
चौथा भाग एक उपसंहार के रूप में है, जहां पर ना चाहते हुए भी हमे अपने आप को एक सामान्य स्थिति में लाना पड़ता है।
पाठकों से यही कहूंगी की एक बार जीवन के रंगो का स्वाद चखने के लिए" सूखा पत्ता"अवश्य पढ़े।
2 reviews
September 2, 2021
समाज के अलग अलग आयामों पर अपनी छाप छोड़ने वाली यह पुस्तक एक अलग ही अहसास देती है। कृष्णकुमार और उर्मिला के प्रेम कथा के सहारे समाज के अनेक ढकोसलों पर चोट मारी गई है।
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