स्वयं को महाराणा प्रताप का वंशज मानने वाले गाड्रिये-लुहारों के जीवन चरित पर आधारित हैi रांगेय राघव का यह उपन्यास । आज के प्रगतिशील युग में भी गाहियेष्णुज्ञार आधुनिकता से कोसों दूर अपने ही सिद्धांतों, आदर्श: और जीवन मूल्यों पर चलते है। कभी यर बनाकर न रहने वाले, खानाबदोशों की तरह जीवन यापन करने वाले और समाज से अलग रहने वाले इन याहियेन्तुज्ञारों के जीवन के अनछुए और अनदेखे पहलुओं का जैसा सजीव वर्णन इस उपन्यास में हुआ है, वह रांगेय राघव जैसा मानव मनोभावों का चितेरा लेखक ही कर सकता है।