"झरोखे" पढ़ने के बाद मैं भीषम साहनी जी की लेखनी से खासा प्रभावित था। इसी लिए प्रगति मैदान में लगे विश्व पुस्तक मेले से उन की लिखी और दो-तीन किताबें उठा लाया। "हानूश" उन में से एक थी। हानूश भीषम जी का लिखा पहला नाटक था। शायद इसी लिए उतना बेहतर नहीं था जितने बाकी नाटक लिखे गए हैं। नाटक की कहानी चेकोस्लोवाकिया की लोक-कथा से प्रेरित है। नाटक के पात्र बहुत सही ढंग से चुने गए हैं। ख़ास कर के दुसरे भाग में व्यापारियों का वार्तालाप अत्यंत रोचक है और "12 एंग्री मेन" की फील देता है। हर एक पात्र का एक उद्देश्य था जो कि बहुत ही सुस्पष्ट था। इसी लिए पढ़ने का और मज़ा आ रहा था।
मगर नाटक में कई जगह ऐसा लगा कि जैसे कुछ संवादों को ज़बरदस्ती कहानी में घुसाया गया है। मैंने भीषम जी की बहुत रचनाएँ नहीं पढ़ी हैं लेकिन जितनी पढ़ी हैं उन से ऐसा लगा कि वह समाज पर बहुत बढ़िया तंज कसते हैं। "झरोखे" भी इस से भरपूर थी। लेकिन हानूश में कई जगह वह तंज सस्ते में निपट गए। ऐसा लगा जैसे सिर्फ तंज मारने को ही वह संवाद लिखा हो, चाहे कहानी से कोई ताल्लुक़ न भी हो।
बहरहाल नाटक की भाषा बहुत सरल है और पढ़ने में ज़्यादा समय नहीं लगता। तो इसी लिए आप सब भी एक बार ज़रूर पढ़ें।