नवम मण्डल के लगभग सभी सूक्तों के देवता पवमान सोम के सम्बन्ध में अनेक धारणाएं है। सोम ऐसा दिव्य प्रवाह है, जो सूर्य को तेजस्वी बनाता है, प्रक्रति की अनेक प्रतिक्रियाओं का संचालन है। किरणों एवं जल धाराओं के साथ प्रवहणशील है, वनस्पतियों में स्थिति हैं, प्राणियों के मन और इन्द्रियों को पुष्ट करने वाला है आदि। सोमवल्ली से निकाले गये सोमरस को भी सोम ही कहा गया है। विभिन्न मंत्रों में भिन्न-भिन्न प्रकार के सोम प्रवाहो का वर्णन है कुछ आचार्यों ने मंत्रों का केवल यज्ञीय कर्मकाण्ड परक अर्थ किया है, जिसमें सोम को निचोड़ कर विभिन्न प्रकार से यज्ञार्थ तैयार करने की बात की गई है; किन्तु मंत्र सोम की विभिन्न धाराओं के उदघोषक है, इसलिए इस भाषार्थ में यथा साध्य स्वभाविक धाराओं-प्रक्रियाओं को इंगित करने वाले अर्थ किये गये है-
हे सोमदेव ! आप इन्द्रदेव के लिए पान करने हेतु निकाले गये है, अतः अत्यन्त स्वादिष्ट, हर्ष प्रदायक धार के रूप में प्रवाहित हो ।। 1 ।।
7692 रक्षोहा विश्वतर्षणिरभि योनिमयोहतम्। द्रुणा सधस्थमासदत् ।। 2 ।। दुष्टों का नाश करने वाले मानवों के लिए हितकारी, सोमदेव शुद्ध होकर सुवर्ण पात्र (द्रोण कलश) में भरकर यज्ञ स्थल पर प्रतिष्ठित हो गये है ।। 2।।
हे सोमदेव ! आप महान ऐश्वर्य प्रदाता तथा शत्रुओं (विकारों) को नष्ट करने वाले हों। वृत्रासुर का हनन करके, उसका महान धन हमें प्रदान करें।। 3 ।। (इस ऋचा में पौराणिक वृत्रासुर का धन अनीत से बचाकर सत्कार्यों के लिए देने तथा दुष्प्रवृत्ति रूपी असुर से जीवन-सम्पदा छीनकर देव प्रयोजनों में लगाने का भाव है।)
तेजस्वी दिखाई पड़ने वाले इस सोमरस को उगलियाँ लाती और दबाकर निकालती हैं। इस दुःख निवारक मधुर रस में तीन शक्तियाँ (शरीर, मन और बुद्धि को सामार्थ प्रदान करने वाली) विद्यमान हैं।।8।।
हे सामदेव ! देव शक्तियों का सन्निध्य पाने की इच्छा करने वाले आप तीव्र गति से शोधित हों। हे सोमदेव ! बलवर्द्धक आप इन्द्रदेव की तृप्ति के लिए प्रतिष्ठित हों।। 1 ।।
7702 आ वच्यस्व महि प्यारो वृषेन्दो द्युम्रवत्तमः। आ योनिं धर्णसिः सदः ।। 2 ।।
हे सोमदेव ! शौर्यवान, दीप्तिमान् और सर्वधारण गुणों से युक्ति आप हमें प्रचुर मात्रा में अन्न और बल प्रदान करें तथा आप निर्धारित स्थल पर पधारे ।। 2 ।।
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