“साहित्य अकादमी पुरस्कार – 2023” से पुरस्कृत किताब
“मुझे पहचानो” समाज के धार्मिक, सांसारिक और बौद्धिक पाखंड की परतें उधेड़ता है। सती होने की प्रथा प्राचीन काल से ही चली आ रही है। इस अमानवीय परंपरा के पीछे मूल कारक सांस्कृतिक गौरव है।
सांस्कृतिक गौरव के साथ शुचिता का प्रश्न स्वतः उभरता है। इसमें समाहित है वर्ण की शुचिता, वर्ग की शुचिता, रक्त की शुचिता और लैंगिक शुचिता इत्यादि। इसी क्रम में पुरुषवादी यौन शुचिता की परिणति के रूप में सतीप्रथा समाज के सामने व्याप्त होती है। समाज के कुछ प्रबुद्ध लोगों के नजरिये से परे यह प्रथा सर्वमान्य रही है और वर्तमान समय में भी गौरवशाली संस्कृति के हिस्से के रूप में स्वीकार्य है। महत्त्वपूर्ण और निराशाजन&#
अफ़सोस है मैं इस किताब को देर से पढ़ा, साहित्य अकैडमी पुरस्कार (2023) प्राप्त यह किताब अंधविश्वास और लोक कथाओं पर गहरा चोट करती है सती प्रथा के आस पास बुनी गई और लिखी गई यह किताब झकझोर देती है। “मुझे पहचानों” किताब का नाम भी इतना रिलवेंट है कि अंत में किताब ख़त्म होने तक आप सोचते रहते है।
अंत में कई उदाहरण के प्रयोग से चाहे गाँधी हो या महाभारत सभी से लेखक ने बेहतर ढंग से समझाया है कि ज़िंदगी में मानव होना कितना ज़रूरी है। कुछ उपमा बेहतरीन लगेंगे आपको चाहे वो अजगर का ही क्यूँ ना हो।
धार्मिक अमानवीय मान्यताओं और पाखंडों को जिस तरह से किताब खंडित खंडित करती है वो बेहतरीन शब्द कमाल के है भाषा बेहतरीन है ।