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एक इंच मुस्कान

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Ek Inch Muskan

160 pages, Paperback

First published January 1, 1976

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About the author

Rajendra Yadav

139 books18 followers
राजेन्द्र यादव हिन्दी के सुपरिचित लेखक, कहानीकार, उपन्यासकार व आलोचक होने के साथ-साथ हिन्दी के सर्वाधिक लोकप्रिय संपादक भी थे। नयी कहानी के नाम से हिन्दी साहित्य में उन्होंने एक नयी विधा का सूत्रपात किया। उपन्यासकार मुंशी प्रेमचन्द द्वारा सन् 1930 में स्थापित साहित्यिक पत्रिका हंस का पुनर्प्रकाशन उन्होंने प्रेमचन्द की जयन्ती के दिन 31 जुलाई 1986 को प्रारम्भ किया था। यह पत्रिका सन् 1953 में बन्द हो गयी थी। इसके प्रकाशन का दायित्व उन्होंने स्वयं लिया और अपने मरते दम तक पूरे 27 वर्ष निभाया।

28 अगस्त 1929 ई० को उत्तर प्रदेश के शहर आगरा में जन्मे राजेन्द्र यादव ने 1951 ई० में आगरा विश्वविद्यालय से एम०ए० की परीक्षा हिन्दी साहित्य में प्रथम श्रेणी में प्रथम स्थान के साथ उत्तीर्ण की। उनका विवाह सुपरिचित हिन्दी लेखिका मन्नू भण्डारी के साथ हुआ था। वे हिन्दी साहित्य की सुप्रसिद्ध हंस पत्रिका के सम्पादक थे।

हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा राजेन्द्र यादव को उनके समग्र लेखन के लिये वर्ष 2003-04 का सर्वोच्च सम्मान (शलाका सम्मान) प्रदान किया गया था।

28 अक्टूबर 2013 की रात्रि को नई दिल्ली में 84 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ।

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Displaying 1 - 6 of 6 reviews
Profile Image for Rajan.
637 reviews42 followers
July 30, 2015
This book is an rare experiment. The authors are big guns of hindi literature and real life husband and wife. The story is also of a husband and wife who grows apart due to differences. Alternate chapters are written by Rajendra yadav and Mannu Bhandari from hero and heroine point of view respectively. It gives a good peek into differing mental and emotional responses of male and female to a similar situation. Mannu Bhandari brings out emotions of a woman in love beautifully.
Must read for die hard romantics. others should stay away or read at their own risk
Profile Image for Tarun Pandey.
41 reviews1 follower
August 17, 2024
उपन्यास : एक इंच मुस्कान

सृजनकर्ता : मन्नु भंडारी जी और राजेंद्र यादव जी

ग्यारह सपनों का देश उपन्यास के सृजन की समस्याओं की चर्चा हिंदी साहित्य में हमेशा होगी। उस उपन्यास के दूसरे खण्ड में 'राजेंद्र यादव' जी लिखते हैं "लेखन भी एक 'सहयोगी प्रयास' हो , यह बात मेरी समझ में नहीं आती - चाहे वो एक रूपरेखा पर हो या बिना रूपरेखा के"। उस उपन्यास के एक और लेखक 'लक्ष्मीचंद्र जैन' अच्छी तरह समझते हैं कि लेखकों को साथ ला कर किसी उपन्यास का सृजन करना कितना दुर्लभ कार्य है और एक शाम 'राजेन्द्र यादव' तथा 'मन्नू भंडारी' से गुफ़्तुगू के दौरान इसी श्रृंखला को आगे बढ़ाने हेतु दोनों को साथ में लिखने का सुझाव देते हुए विदा लेते हैं। नतीज़ा आप सब के सामने है - एक इंच मुस्कान।

किरदार - अमर, अमला, रंजना, शकुन, टण्डन, मंदा, हल्ली इत्यादी।

कहानी की पृष्ठभूमि

यह कहानी अमर, अमला और रंजना के जीवन के इर्द-गिर्द घूमती है। पूरा उपन्यास पाँच अध्याय में विभाजित है। एक अध्याय 'राजेन्द्र यादव' जी के द्वारा तो दूसरा 'मन्नु भंडारी' जी के द्वारा लिखा गया है फिर बारी बारी यही क्रम दोहराया गया है।

अमला - एक सशक्त महिला जो बड़े ( समृद्ध, सम्पन्न ) घर से नाता रखती है और परित्यक्ता है। अपने बहुत पुराने मित्रों से जिसका रिश्ता लगभग टूट चुका है और जिसके जीवन में पुरुष का अभाव है। उसे ये बात अंदर अंदर कचोटती भी है। साहित्य में रुचि लेती है और अमर से ख़ासा प्रभावित है।

अमर - एक लेखक जिसका जीवन रंजना और अमला के मध्य निरन्तर पेंडुलम समान झूलता है। जो लेखनी के लिए ही बना है और अपना संपूर्ण जीवन लेखनी को समर्पित कर चुका है। उसके जीवन में जो परिवर्तन आते हैं उसकी दास्ताँ है एक इंच मुस्कान।

अमला का कथन कि "हर प्रकार का समझौता कला को पथभ्रष्ट करता है" कैसे इस उपन्यास को एक दिशा प्रदान करता है और अमर तथा रंजना के दांपत्य जीवन में तूफ़ान लाता है देखने योग्य है। अमर के किरदार को समझ कर आप को कला से जुड़े व्यक्तियों को क्या और किस तरह की परिस्थितियों से गुज़रना होता है यह महसूस कर पाने में आसानी होगी। उससे आप प्यार, सहानुभूति, और नफ़रत तीनों एक साथ करेंगे। शायद दुआ भी करें कि उसका यश छीन जाए और कहीं न कहीं हाथ जोड़ कर अपने ईश्वर से प्रार्थना भी करेंगे कि इसकी मौत अमर करना। बाक़ी आप उससे घृणा करते हैं या प्यार ये आपको उपन्यास पढ़ कर ही महसूस होगा। कहीं पर भी 'राजेंद्र यादव' जी ने अमर के किरदार को बचाने का काम किया ही नहीं बल्क़ि उसके किरदार के द्वारा संजीदगी से बहुत से अनकहे सवालों के जवाब दिए।

रंजना - अमर के प्रेम में एक पागल स्त्री जो अपना तन, मन, धन सब अमर पर न्योछावर कर चुकी है। जो अमर पर अंकुश तो नहीं लगाना चाहती है किंतु अपने बाहों के घेरे में उसे समा लेना चाहती है और अमला से चिढ़ती भी है। जिसका गृहस्थ जीवन बर्बाद हो गया, जिसका बच्चा गिरा दिया गया, जिसके अभिमान को अमर ने अपने व्यवहार से पैरों तले कुचल दिया और अमला ने शायद उसके पति के अंदर के लेखक को ज़िंदा रख कर अमर को रंजना से दूर कर दिया। क्या रंजना को प्रेम करने की सज़ा मिली या फिर वो समझ नहीं पाई कि अमर और अमला एक दूसरे से दुःख के कारण जुड़ें हैं और वो बंधन कितना मज़बूत है? इस रिश्ते की गाठ जोड़ इस उपन्यास का एक बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा है।

टण्डन - अमर का मित्र, रंजना और अमर के जीवन में एक सेतु का काम करने वाला किरदार, कभी उनका अभिभावक तो कभी उनका परम मित्र और हितैषी। मंदा टण्डन की भार्या हैं।

शकुन - अमर की पुरानी मित्र, जिनके साथ वो बचपन में समय बिताया करता। अमला की तरह ही परित्यक्ता है। उसके आँचल में छुप कर उससे बात करके मन के बोझ को उतार देना अमर को पसंद था। उसके जीवन में उसकी जगह एक अच्छे दोस्त की है। वो उसे समझती है और प्रोत्साहित करती है निरन्तर आगे बढ़ने को तथा बातों बातों में उससे नोक-झोंक भी करती रहती है।

हल्ली - रंजना और अमर का नौकर।

उपन्यास को क्यों पढ़ें

1- मन्नु भंडारी जी और राजेन्द्र यादव जी द्वारा लिखा यह उपन्यास साहित्य जगत में एक प्रयोगवादी परम्परा को आगे ले जाता है। ग्यारह सपनों का देश, गर्दिश के दिन जैसे उपन्यासों की कड़ी में इसे शामिल करना ग़लत न होगा।

2- इस उपन्यास के एक किरदार के कारण मैं इस उपन्यास से बंधा रहा- अमर। इस उपन्यास को वे लोग ज़रूर पढ़ें जो लेखनी से ताल्लुक़ रखते हैं क्योंकि एक लेखक के परिप्रेक्ष्य को हमारे सामने रखने का कार्य 'राजेन्द्र यादव' जी बख़ूबी करते हैं। इसके विपरीत 'मन्नु भंडारी' जी की अत्यंत प्रभावशाली लेखनी रंजना को नायिका के रूप में उजागर करती हुई उनके संघर्ष को हमारे सामने रखती है। अमर एक लेखक के रूप में वाह वाही तो बटोरते रहता है लेकिन एक लेखक के जीवन को सही मायनों में हमारे सामने प्रस्तुत भी करता है। अंततः लेखन से जुड़े व्यक्तियों के लिए अमर सच्चा है तो दूसरे पेशेवर लोगों के लिए शायद दोगला। अमला को एक पत्र में अमर लिखता है कि "रंजना ईर्ष्यालु पत्नी हो सकती है, लेकिन कला सबसे ज़्यादा ईर्ष्यालु पत्नी है"। इस पंक्ति के माध्यम से शायद वो कला में ख़ुद को निखारने हेतु इंसान क्या क्या त्याग करता है उस तरफ़ इशारा करना चाहता है। न जाने कितनी ही ऐसे संवाद हैं जिसपे बहस हो सकती है।

3- पत्र लेखन और संवाद का जो सिलसिला चलता है किरदारों के बीच वो सराहनीय है। हर एक पत्र आत्मा को छलनी कर रख देता। कृशन चंद्र जी के पुस्तक एक वायलिन समुंदर के किनारे ( 1971) में जो पत्रों की विशेषता बताई गई है कि आत्मियता का परिचय पत्र द्वारा ही दिया जा सकता है कहीं न कहीं वो एक इंच मुस्कान (1963) को पढ़ कर भी मसहूस होती है। यहाँ किरदार जो बात आमने सामने नहीं बोल पाते हैं उससे कहीं ज़्यादा हो लिख कर अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करते हैं।

लव मैरिज / अरेंज्ड मैरिज को लेके बात हो या फिर कलाकार के जीवन को लेके या घरेलू औरत के व्यवहार को लेके हर बार आप ख़ुद को भी उस संवाद का हिस्सा बनते पाएँगे।

4- किसी न किसी किरदार से ऐसा लगाव हो सकता है कि आप को दूसरे से ईर्ष्या हो जाएगी। मेरे साथ ऐसा हुआ कि मुझे अमर का अधूरापन नज़र आया। ऐसा लगा जैसे उसकी बात अधूरी छूट गयी हो। कुछ अंदर ही अंदर मर गया हो। उसके मनोवैज्ञानिक स्थितियों को समझने में ही जैसे समय बिता और किसी निष्कर्ष पर पहुँच पाना बहुत दुर्लभ कार्य रहा।

©® तरुण पाण्डेय
Profile Image for Animesh Priyadarshi.
43 reviews4 followers
February 7, 2022
दाम्पत्य जीवन की कश्मकश और छटपटाहट का द्विपक्षीय चित्रण, स्त्री पात्रों का पक्ष मन्नू जी ने बखूबी रखा है और राजेंद्र जी ने अपने पुरुष का पक्ष और उसकी मजबूरियों का भी बखूबी वर्णन किया है। दाम्पत्य जीवन का दर्शन कह सकते हैं इस उपन्यास को। वाकई पठनीय है।
Profile Image for Iqra Tasmiae.
439 reviews44 followers
January 19, 2019
This book will always remain with me in the best of my memories. Several reasons for that. One, the place where I read it. I call it my bower. It was in Pipla, somewhere in Hindu tola as people later told me, but whatever it was it was so peaceful and serene. It was a mini bridge whose walls had partially broken down. It used to sit there. On the front there was a ditch which didn't have water. A tree grew on the right side of this ditch and its trunk fell horizontally in the ditch and straightened again when reached its left. It was kind of unique. So anyway, all the four sides of this bridge were quite scenic and I'm not good at describing things so I leave it there.
The second reason why this book remains special is the character of Amla. At so many instances I've felt that it was not her but I myself was saying all that was written. At the same time she's the most enigmatic character. And the most intriguing part about her character is that while at one point I could absolutely relate to her, yet when the story would offer Ranjana's perspective I would hate her, hate those very values which she upheld and due to which I found her unique.
Third, this book inspired me to write myself. When I read I felt I too could write a similar tale, put forth what I had felt and how those notions had been received by others.
Fourth, the person who made me read it.
This entire review has been hidden because of spoilers.
212 reviews
May 14, 2025
it is a different type of novel. cowritten by husband and wife, both literary giants, alternative chapters have been written by them.
but if sees from todays point of view, dialogues seems too filmy, characters using chaste Hindi. may be when written (around 50myears back) it was the trend. has touched some relevant topics- love V/s arranged marriage. marriage with an artist. marriage between two artist.
Profile Image for Shashwat Ratna Mishra.
80 reviews
August 10, 2025
एक इंच मुस्कान मन्नू भंडारी और उनके पति राजेन्द्र यादव द्वारा लिखा गया एक सहयोगात्मक उपन्यास है, जो अपने आप में एक दिलचस्प प्रयोग है। कहानी की थीम अच्छी है और कई हिस्से वाकई काफ़ी इंटेंस और सोचने लायक हैं।

लेकिन अगर मैं अपनी बात करूँ, तो शायद मुझे इस उपन्यास से जितनी उम्मीद थी, वो पूरी नहीं हो पाई। ऐसा नहीं कि किताब बुरी है, बिलकुल नहीं - पर आपका बंटी या महाभोज जैसी गहराई, भावनात्मक जुड़ाव और आकर्षण इसमें मुझे थोड़ा कम महसूस हुआ। कुछ तो था जो अधूरा-सा लगा। शायद कहानी की प्रस्तुति थोड़ी सीधी थी, या फिर मैं उसका सही मतलब पकड़ नहीं पाया, कहना मुश्किल है।

हाँ, एक बात पक्की है कि किताब एक अच्छा सामाजिक संदेश ज़रूर देती है, और यह दिखाती है कि रिश्तों में संवाद और समझ की कितनी ज़रूरत होती है। मेरी सलाह यही होगी कि अगर आप पहली बार इनके लेखन से जुड़ना चाहते हैं, तो शुरुआत आपका बंटी या महाभोज जैसी रचनाओं से करें, वहाँ से आप ज़्यादा जुड़ाव महसूस करेंगे :)
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