उपन्यास : एक इंच मुस्कान
सृजनकर्ता : मन्नु भंडारी जी और राजेंद्र यादव जी
ग्यारह सपनों का देश उपन्यास के सृजन की समस्याओं की चर्चा हिंदी साहित्य में हमेशा होगी। उस उपन्यास के दूसरे खण्ड में 'राजेंद्र यादव' जी लिखते हैं "लेखन भी एक 'सहयोगी प्रयास' हो , यह बात मेरी समझ में नहीं आती - चाहे वो एक रूपरेखा पर हो या बिना रूपरेखा के"। उस उपन्यास के एक और लेखक 'लक्ष्मीचंद्र जैन' अच्छी तरह समझते हैं कि लेखकों को साथ ला कर किसी उपन्यास का सृजन करना कितना दुर्लभ कार्य है और एक शाम 'राजेन्द्र यादव' तथा 'मन्नू भंडारी' से गुफ़्तुगू के दौरान इसी श्रृंखला को आगे बढ़ाने हेतु दोनों को साथ में लिखने का सुझाव देते हुए विदा लेते हैं। नतीज़ा आप सब के सामने है - एक इंच मुस्कान।
किरदार - अमर, अमला, रंजना, शकुन, टण्डन, मंदा, हल्ली इत्यादी।
कहानी की पृष्ठभूमि
यह कहानी अमर, अमला और रंजना के जीवन के इर्द-गिर्द घूमती है। पूरा उपन्यास पाँच अध्याय में विभाजित है। एक अध्याय 'राजेन्द्र यादव' जी के द्वारा तो दूसरा 'मन्नु भंडारी' जी के द्वारा लिखा गया है फिर बारी बारी यही क्रम दोहराया गया है।
अमला - एक सशक्त महिला जो बड़े ( समृद्ध, सम्पन्न ) घर से नाता रखती है और परित्यक्ता है। अपने बहुत पुराने मित्रों से जिसका रिश्ता लगभग टूट चुका है और जिसके जीवन में पुरुष का अभाव है। उसे ये बात अंदर अंदर कचोटती भी है। साहित्य में रुचि लेती है और अमर से ख़ासा प्रभावित है।
अमर - एक लेखक जिसका जीवन रंजना और अमला के मध्य निरन्तर पेंडुलम समान झूलता है। जो लेखनी के लिए ही बना है और अपना संपूर्ण जीवन लेखनी को समर्पित कर चुका है। उसके जीवन में जो परिवर्तन आते हैं उसकी दास्ताँ है एक इंच मुस्कान।
अमला का कथन कि "हर प्रकार का समझौता कला को पथभ्रष्ट करता है" कैसे इस उपन्यास को एक दिशा प्रदान करता है और अमर तथा रंजना के दांपत्य जीवन में तूफ़ान लाता है देखने योग्य है। अमर के किरदार को समझ कर आप को कला से जुड़े व्यक्तियों को क्या और किस तरह की परिस्थितियों से गुज़रना होता है यह महसूस कर पाने में आसानी होगी। उससे आप प्यार, सहानुभूति, और नफ़रत तीनों एक साथ करेंगे। शायद दुआ भी करें कि उसका यश छीन जाए और कहीं न कहीं हाथ जोड़ कर अपने ईश्वर से प्रार्थना भी करेंगे कि इसकी मौत अमर करना। बाक़ी आप उससे घृणा करते हैं या प्यार ये आपको उपन्यास पढ़ कर ही महसूस होगा। कहीं पर भी 'राजेंद्र यादव' जी ने अमर के किरदार को बचाने का काम किया ही नहीं बल्क़ि उसके किरदार के द्वारा संजीदगी से बहुत से अनकहे सवालों के जवाब दिए।
रंजना - अमर के प्रेम में एक पागल स्त्री जो अपना तन, मन, धन सब अमर पर न्योछावर कर चुकी है। जो अमर पर अंकुश तो नहीं लगाना चाहती है किंतु अपने बाहों के घेरे में उसे समा लेना चाहती है और अमला से चिढ़ती भी है। जिसका गृहस्थ जीवन बर्बाद हो गया, जिसका बच्चा गिरा दिया गया, जिसके अभिमान को अमर ने अपने व्यवहार से पैरों तले कुचल दिया और अमला ने शायद उसके पति के अंदर के लेखक को ज़िंदा रख कर अमर को रंजना से दूर कर दिया। क्या रंजना को प्रेम करने की सज़ा मिली या फिर वो समझ नहीं पाई कि अमर और अमला एक दूसरे से दुःख के कारण जुड़ें हैं और वो बंधन कितना मज़बूत है? इस रिश्ते की गाठ जोड़ इस उपन्यास का एक बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा है।
टण्डन - अमर का मित्र, रंजना और अमर के जीवन में एक सेतु का काम करने वाला किरदार, कभी उनका अभिभावक तो कभी उनका परम मित्र और हितैषी। मंदा टण्डन की भार्या हैं।
शकुन - अमर की पुरानी मित्र, जिनके साथ वो बचपन में समय बिताया करता। अमला की तरह ही परित्यक्ता है। उसके आँचल में छुप कर उससे बात करके मन के बोझ को उतार देना अमर को पसंद था। उसके जीवन में उसकी जगह एक अच्छे दोस्त की है। वो उसे समझती है और प्रोत्साहित करती है निरन्तर आगे बढ़ने को तथा बातों बातों में उससे नोक-झोंक भी करती रहती है।
हल्ली - रंजना और अमर का नौकर।
उपन्यास को क्यों पढ़ें
1- मन्नु भंडारी जी और राजेन्द्र यादव जी द्वारा लिखा यह उपन्यास साहित्य जगत में एक प्रयोगवादी परम्परा को आगे ले जाता है। ग्यारह सपनों का देश, गर्दिश के दिन जैसे उपन्यासों की कड़ी में इसे शामिल करना ग़लत न होगा।
2- इस उपन्यास के एक किरदार के कारण मैं इस उपन्यास से बंधा रहा- अमर। इस उपन्यास को वे लोग ज़रूर पढ़ें जो लेखनी से ताल्लुक़ रखते हैं क्योंकि एक लेखक के परिप्रेक्ष्य को हमारे सामने रखने का कार्य 'राजेन्द्र यादव' जी बख़ूबी करते हैं। इसके विपरीत 'मन्नु भंडारी' जी की अत्यंत प्रभावशाली लेखनी रंजना को नायिका के रूप में उजागर करती हुई उनके संघर्ष को हमारे सामने रखती है। अमर एक लेखक के रूप में वाह वाही तो बटोरते रहता है लेकिन एक लेखक के जीवन को सही मायनों में हमारे सामने प्रस्तुत भी करता है। अंततः लेखन से जुड़े व्यक्तियों के लिए अमर सच्चा है तो दूसरे पेशेवर लोगों के लिए शायद दोगला। अमला को एक पत्र में अमर लिखता है कि "रंजना ईर्ष्यालु पत्नी हो सकती है, लेकिन कला सबसे ज़्यादा ईर्ष्यालु पत्नी है"। इस पंक्ति के माध्यम से शायद वो कला में ख़ुद को निखारने हेतु इंसान क्या क्या त्याग करता है उस तरफ़ इशारा करना चाहता है। न जाने कितनी ही ऐसे संवाद हैं जिसपे बहस हो सकती है।
3- पत्र लेखन और संवाद का जो सिलसिला चलता है किरदारों के बीच वो सराहनीय है। हर एक पत्र आत्मा को छलनी कर रख देता। कृशन चंद्र जी के पुस्तक एक वायलिन समुंदर के किनारे ( 1971) में जो पत्रों की विशेषता बताई गई है कि आत्मियता का परिचय पत्र द्वारा ही दिया जा सकता है कहीं न कहीं वो एक इंच मुस्कान (1963) को पढ़ कर भी मसहूस होती है। यहाँ किरदार जो बात आमने सामने नहीं बोल पाते हैं उससे कहीं ज़्यादा हो लिख कर अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करते हैं।
लव मैरिज / अरेंज्ड मैरिज को लेके बात हो या फिर कलाकार के जीवन को लेके या घरेलू औरत के व्यवहार को लेके हर बार आप ख़ुद को भी उस संवाद का हिस्सा बनते पाएँगे।
4- किसी न किसी किरदार से ऐसा लगाव हो सकता है कि आप को दूसरे से ईर्ष्या हो जाएगी। मेरे साथ ऐसा हुआ कि मुझे अमर का अधूरापन नज़र आया। ऐसा लगा जैसे उसकी बात अधूरी छूट गयी हो। कुछ अंदर ही अंदर मर गया हो। उसके मनोवैज्ञानिक स्थितियों को समझने में ही जैसे समय बिता और किसी निष्कर्ष पर पहुँच पाना बहुत दुर्लभ कार्य रहा।
©® तरुण पाण्डेय