संसार को तो उन लोगों की प्रशंसा करने में आनन्द आता हैं, जो अपने घर को भाड़ में झोंक रहे हों गैरों के पीछे अपना सर्वनाश किये डालते हों। जो प्राणी घरवालों के लिए मरता हैं, उसकी प्रशंसा संसारवाले नहीं करते। वह तो उनकी दृष्टि में स्वार्थी हैं, कृपण हैं, संकीर्ण हृदय हैं, आचार-भ्रष्ट हैं। इसी तरह जो लोग बाहरवालों के लिए मरते हैं, उनकी प्रशंसा घरवाले क्यों करने लगे!

