'आदिवासी जालियाँवाला' आजादी के पहले और उसके बाद आदिवासियों के कत्लेआम के विरुद्ध प्रतिरोध का दस्तावेज है। इस अर्थ में यह आदिवासियों के विस्तृत इतिहास की खोज है। कवि इस बात से भली-भाँति परिचित है कि इतिहास को दफन किए बिना कोई भी औपनिवेशिक प्रक्रिया नहीं चलाई जा सकती है। आदिवासी इतिहास के साथ यह आजादी के पहले भी हुआ और बाद भी निरंतर जारी है। बहुत ही सचेत होकर कवि कहते हैं कि इतिहास के एक छोर में एकलव्य हैं तो दूसरे छोर पर मानगढ़ की महान शहादत है। आदिवासी इतिहास का दोनों छोर उपेक्षित है। इसे क्यों नजरअंदाज किया गया? यह सवाल कवि को बेचैन करता है। तब वह अपनी कलम चलाता है– 'चलो मानगढ़ की धरती पर। जिसकी घटना का अब भी वृतांत अनलिखा। यदि इतिहास न लिख पाओ तो साथी, लिखो उसी पर कविताÓ। इतिहास से गुजरते हुए यथार्थ के अनुभव उसकी बेचैनी को परिपक्व बनाते हैं, तब वह प्रतिबद्ध होकर कहता है– 'लिखने दो। इतिहास आज मुझको कविता में।' एक स्वाभाविक सवाल खड़ा होता है–क्या कविता में इतिहास लिखना संभव है? अगर ऐसा है तो फिर क्या काव्यात्मकता और ऐतिहासिकता का संकट नहीं होगा? एक कवि के रूप में हरिराम मीणा इस सवाल के प्रति न केवल सचेत हैं बल्कि इस सवाल का ठोस जवाब उनके पास मौजूद है। यह जवाब आदिवासी समाज की पुरखा विरासत में ही मौजूद है। आदिवासियों ने अपने इतिहास को कविता में ही सदियों से दर्ज किया है। गीति रूप में दर्ज उनकी कविताओं में अदम्य साहस और आजादी का लहू किसी अनजानी सदी से लगातार बहता चला आ रहा है। महान क्रांतिकारी बिरसा मुण्डा को कहाँ किस शासन या उसके इतिहासकार ने खड़ा किया? उसी तरह सिद्दू-कानू, तिलका मांझी, फूलो, झालो, सिनगी दई, नीलांबर-पीतांबर, गुण्डाधुर आदि को किसी दूसरे की कलम की क्या जरूरत थी? उन्हें तो जनता की कविता ने अपने हृदयों में जीवित रखा। ऐसे में यदि कोई आदिवासी कवि कविता में इतिहास लिखने की कवायद कर रहा हो तो फिर काव्यात्मकता और ऐतिहासिकता का सवाल ही क्यों? यह आदिवासी काव्यात्मकता और ऐतिहासिकता है–छल, छद्य और आभिजात्य बोध की क्रत्रिमता से दूर सरल, सहज, ग्राध्य और प्रवाहमान। कवि ने कविता के जरिए फिर से विमर्श खड़ा किया है–केवल कविता में ही नहीं, बल्कि इतिहास में भी। जब-जब उत्पीडि़त समुदाय की कलम उठेगी, यह विमर्श खड़ा होगा। हरिराम मीणा आदिवासी समाज के वरिष्ठ बुद्धिजीवी, कवि, चिंतक, विचारक हैं। लम्बे समय से लेखन की परिपक्वता उनकी रचनाओं में दिखाई देती है। इस नए संकलन में उन्होंने मानगढ़ पर लिखी लम्बी कविता को अपनी वैचारिकी का केन्द्र बताया है। यह वैचारिकी समस्त आदिवासी समाज के यथार्थ को प्रस्तुत करने के लिए प्रतिबद्ध है। यह सिर्फ आदिवासी यथार्थ की अभिव्यक्ति नहीं बल्कि समग्र मनुष्यता का सान्द्र काव्यात्मक विश्लेषण है। – अनुज लुगुन
राजस्थान के जिला सवाई माधोपुर के ग्राम बामनवास में एक मई सन उन्नीस सौ बावन को जन्म। राजस्थान विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातकोत्तर डिग्री। सेवानिवृत्त पुलिस महानिरीक्षक। प्रकाशित पुस्तकें : अब तक दो कविता संकलन, एक प्रबंध काव्य, तीन यात्रा वृत्तान्त, एक उपन्यास, आदिवासी विमर्श की दो पुस्तकें तथा समकालीन आदिवासी कविता (सम्पादित) प्रकाशित। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं, आकाशवाणी एवं दूरदर्शन से रचनाएँ व वार्ता आदि का प्रकाशन एवं प्रसारण। पुरस्कार : भारतीय पुलिस पदक, राष्ट्रपति पुलिस पदक, वन्यजीव संरक्षण के लिए पद्मश्री सांखला अवार्ड, डा. अम्बेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार, राजस्थान साहित्य अकादमी का सर्वोच्च ‘मीरां पुरस्कार, केन्द्रीय हिंदी संस्थान द्वारा महा पंडित राहुल संकृत्यायन सम्मान, बिड़ला फाऊँडेशन के बिहारी पुरस्कार तथा विश्व हिंदी सम्मान से विभूषित। इनकी पुस्तकें देश के दर्जनों विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में शामिल है। इनके साहित्य पर विभिन्न विश्वविद्यालयों के सौ से ऊपर एम.फिल. एवं आधा दर्ज़न पीएच.डी. की जा चुकी है। सम्प्रति : अध्यक्ष, अखिल भारतीय आदिवासी साहित्य मंच, दिल्ली। संपर्क : 31, शिवशक्तिनगर, किंग्स रोड, अजमेर हाई वे, जयपुर-302019 मो. : 9414124101 ई-मेल : hrmbms@yahoo.co.in