मज़ेदार रही दिल्ली दरबार।
राहुल ( पंडित), परिधि, और मोहित ( झाड़ी) की तिकड़ी कमाल थी, पंडित की बेफिक्री और चतुर बुद्धि और झाड़ी का नर्म सुलझा व्यवहार और इन दो दोस्तो की जोड़ी बहुत अच्छी लगी, झाड़ी का हर बात पे शेर सुनना और पंडित का हर शेर का कबाड़ा करना या बखिया उधेड़ देना मज़ेदार रहा।
परिधि थोड़ी उदंड, मगर उतनी ही समझदार और परिपक्व लड़की है।
परिधि और राहुल की प्रेम कहानी भी सुंदर रही।
और हमारे सबसे प्रिय किरदार बटुक शर्मा हाए हाए क्या गज़ब आदमी है और उनकी अंग्रेजी उसका क्या ही कहना, अगर वो गलती से इंग्लैंड चले जाते तो उनकी अंग्रेज़ी से अंग्रेज़ भी घायल हो जाते, खैर अच्छे आदमी थे।
मोहित ( झाड़ी ) का मै कायल हूं, दोस्त ऐसा ही होना चाहिए, जिसने अपने दोस्त पंडित की हर दम हर पल हर घड़ी हर ऊंच नीच में मदद की साथ खड़ा रहा, कंधे से कंधा मिलाएं, हाए शाबास।
और कुछ बातें जो लेखक के कलम से निकली और अच्छी लगी
1. प्रेम, पानी और प्रयास की अपनी ही जिद्द होती है और अपना ही रास्ता।
2. मांँ लड़कों की पंचिंग बैग होती है। उनका स्ट्रेस बस्टर। दारू पीकर उन्हें दसियो प्रेमिकाएं याद आ सकती है, मगर आँसू पीते हुए उन्हें बस माँ ही याद आती है।
मांँ ने कभी छड़ी उठाई भी होगी तो बस इस वजह से कि पापा से कम मार पड़े।
माँ, लड़कों की सहेली कभी नही होती।
फिर भी वो बिना कहे परेशानियांँ समझ लेती है।
वो आवाज में उत्साह, खनक, ठहराव, लरजिस और उदासी पहचान लेती है, और महज हैलो कहने के अंदाज से ही जान लेती है कि आपकी मन: स्थिति कैसी है।